अब व्हीलचेयर से सीढियां भी चढ़ सकेंगे दिव्यांग

 ऐसे आविष्कारकों के योगदान सिंगरौली को एक नया पहचान दिलाने में मील का पत्थर साबित होगा 

अब व्हीलचेयर से सीढियां भी चढ़ सकेंगे दिव्यांग

KTG समाचार राजेश वर्मा हेड इंचार्ज सिंगरौली

लक्ष्मी नारायण वर्मा)

अब व्हीलचेयर से सीढियां भी चढ़ सकेंगे दिव्यांग

 ऐसे आविष्कारकों के योगदान सिंगरौली को एक नया पहचान दिलाने में मील का पत्थर साबित होगा 

1992 से हर साल 3 दिसंबर को दुनियाभर में विश्व विकलांग दिवस मनाया जाता है।  संयुक्त राष्ट्र संघ के प्रस्ताव 47/3 द्वारा 1992 में दिव्यांगों के अंतर्राष्ट्रीय दिवस के वार्षिक अवलोकन की घोषणा की गई थी। दिवस मनाने का उद्देश्य दिव्यांगों के मुद्दों की समझ को बढ़ावा देना और दिव्यांग व्यक्तियों की गरिमा, अधिकारों और कल्याण के लिए समर्थन जुटाना है।
सहायक उपकरण ऐसे उपकरण होते हैं जिनका उद्देश्य दिव्यांग लोगों को स्वतंत्र रूप से कार्य करने और उनके जीवन की गुणवत्ता में सुधार करना है। ऐसे उपकरण जैसे व्हीलचेयर से उन लोगों के लिए मदद हो सकती है जो खुद से नहीं चल सकते हैं। 
सहायक उपकरण क्षेत्र के एक ऐसे आविष्कारक और वैज्ञानिक से आज परिचय कराने जा रहे हैं जिनका नाम है रियाज़ रफ़ीक। रियाज़ रफीक़ वैढ़न, जिला सिंगरौली, मध्य प्रदेश के निवासी हैं। जिन्होंने शारीरिक रूप से विकलांग लोगों के जीवन को आसान बनाने और उन्हें चलने फिरने में आत्मनिर्भर बनाने के लिए अपने व्यक्तिगत संसाधनों, धन और दस साल से अधिक समय का निवेश कर "सीढ़ी चढ़ने वाला व्हीलचेयर" का व्यापक शोध कर आविष्कार किया और फिर पेटेंट प्राप्त किया है। इस व्हीलचेयर से सामान्य सतहों पर जा सकते हैं और बिना किसी सहायता के स्वचालित रूप से सीढ़ियां भी चढ़ सकते हैं। इस व्हील्चेयर में एक खास तरह का मेकेनिज्म का आविष्कार किया गया है जिसके वजह से उपयोगकर्ता को केवल व्हीलचेयर को चलाने के लिए कंट्रोल पैनल से सिर्फ दिशा चुनना होगा और यह सीढ़ी चढने के लिये पूरी तरह से स्वचालित होगी इसके अलावा यह अलग अलग आकार के सीढ़ियों पर भी असानी से चलेगी। जहां से प्रेरणा मिली वह घटना साझा करते हुए रियाज़ ने बताया कि वर्ष 2002 में भोपाल रेलवे स्टेशन पर जब एक पैर से अपाहिज व्यक्ति को घसीटते हुए बहुत ही परेशानी से स्टेशन की सीढीयां चढते हुए देखा तो बेचैन हो गए। और तभी ठान लिया की ऐसा व्हीलचेयर डिज़ाइन पर शोध करेंगे जिससे दिव्यांग सीढियां भी आसानी से चढ़ सकेंगे। रियाज़ का कहना है कि विकलांग लोग विकासशील देशों में न केवल सबसे वंचित इंसान हैं, बल्कि वे सबसे अधिक उपेक्षित भी हैं। रियाज़ का प्रयास और आकांक्षाएं विकलांग लोगों को मुख्यधारा में लाना है ताकि वे सामान्य आबादी के साथ जुड़ सकें और उत्पादक जीवन जीते हुए सामाजिक-सांस्कृतिक और आर्थिक गतिविधियों में समान रूप से भाग ले सकें ताकि वे भी राष्ट्र के विकास में अपना योगदान दे सकें। रियाज़ का मानना है कि उनका यह व्हीलचेयर विश्व स्तर पर आत्मनिर्भर भारत की छवि का प्रचार करेगी। हमारे वैज्ञानिकों के इस तरह की उपलब्धियों से भारतीय समाज में स्वदेशी वैज्ञानिकों एवं इंजीनियरों को पश्चिमी देशों के वैज्ञानिकों से कमतर समझने वाली भ्रांतियों को तोड़ने में काफी मदद मिलेगी। आविष्कार सिर्फ एयर कंडीशन लैब और कीमती उपकरण से नहीं होते यह बात रियाज़ ने साबित कर दिया है।

रियाज़ ने मैकेनिकल इंजीनियरिंग विभाग के मशीन डिज़ाइन में मास्टर ऑफ़ टेक्नोलॉजी किया है। उन्होंने अब तक दर्ज़न भर से अधिक आविष्कार किया है और करीब आठ आविष्कारकों को पेटेंट के लिये आवेदन किया है। रियाज़ का दृढ़ विश्वास है कि टेक्नोलॉजी आधारित स्टार्टअप से हमारा देश ना सिर्फ आत्मनिर्भर बनेगा, आर्थिक स्थिरता आयेगी बल्कि बेरोज़गार नवजवानों के लिए रोजगार और लोगों को बेहतर प्रोडक्ट और सर्विस मिल सकेगा। रियाज़ अपने इस व्हीलचेयर वाले आविष्कार को लेकर अपना एक स्टार्टअप शुरू करना चाहते हैं। इस आविष्कार को विकसित करने के लिए उन्हें अनुदान की जरूरत है जिसके लिये वे सरकार से अलग अलग सोशल मीडिया के माध्यम से भी अनुरोध कर ध्यान आकर्षित कराने की कोशिश कर रहे हैं। आविष्कार एक दौड़ है, एक प्रतियोगिता है। दुनिया के हर कोने में काम चल रहा है। हज़ारों वैज्ञानिक सालों से अपने शोध कार्य में लगे हैं। अब वैश्विक प्रतियोगिता में हमारे वैज्ञानिकों के पास इस क्षेत्र में बर्बाद करने के लिये वक़्त नहीं है। संसाधनों और सुविधाओं के अभाव में हमारे वैज्ञानिक दौड़ में कहीं पीछे ना छूट जायें। इसलिये बाद में दुख जताने से बेहतर है हम आज व्यक्तिगत आविष्कारकों एवं वैज्ञानिकों को सुविधाएं, उनका हक और सम्मान दे कर उनका हौसला बुलंद करें। बेहतर यह होगा कि उनके आविष्कार को विकसित करने के लिये सरकार जरुरी सुविधायें एवं संसाधन मुहैया कराये ताकि उनका आविष्कार दिव्यांगों तक पहुंच सके। संसाधनों और सुविधाएं के अभाव में आज प्रतिभाशाली वैज्ञानिक और आविष्कारक गुमनामी के अंधेरे में रहने को मजबूर हैं। अब देखना यह है कि सरकार ऐसे व्यक्तिगत आविष्कारक एवं वैज्ञानिक प्रतिभाओं का कब सुध लेती है।

वर्तमान में सिंगरौली को "ऊर्जा की राजधानी" के रूप में जाना जाता है। लेकिन इतिहास में आविष्कारकों के योगदान सिंगरौली को एक नया पहचान दिलाने में मील का पत्थर साबित होगा।