इंटरनेशनल स्पिरिचुअल काउंसिल फॉर ट्रांसफॉर्मिंग ह्यूमैनिटी (ISCTH) ने वैश्विक गणमान्य व्यक्तियों और मानवतावादियों से तत्काल शांति समाधान की अपील की
आज विश्व सशस्त्र संघर्षों, राजनीतिक प्रतिस्पर्धाओं और गहराते वैचारिक विभाजनों जैसी गंभीर चुनौतियों से जूझ रहा है, जिनके दुष्प्रभाव सम्पूर्ण मानवता पर स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहे हैं। इनके दुष्परिणाम सीमाओं तक सीमित नहीं हैं, बल्कि समाज की संरचना और मानवता के भविष्य को भी गहराई से प्रभावित कर रहे हैं।
शांति को केवल एक आकांक्षा नहीं, बल्कि जीवन की वास्तविकता बनाने के उद्देश्य से स्थापित इंटरनेशनल स्पिरिचुअल काउंसिल फॉर ट्रांसफॉर्मिंग ह्यूमैनिटी (ISCTH) एक ऐसा वैश्विक मंच है जहाँ शांति पर केवल चर्चा नहीं होती, बल्कि संवाद, सहयोग और सार्थक प्रयासों के माध्यम से उसे सक्रिय रूप से साकार किया जाता है। ऐसे समय में, जब संघर्ष लगातार मानव जीवन और वैश्विक स्थिरता के लिए खतरा बने हुए हैं, ISCTH पुनः इस बात पर बल देता है कि स्थायी शांति का मार्ग संवाद, परस्पर समझ और सामूहिक उत्तरदायित्व से होकर ही जाता है।
इस विचार के समर्थन में विभिन्न संस्कृतियों, आस्थाओं और संस्थाओं से जुड़े प्रतिष्ठित व्यक्तित्व निरंतर यह संदेश देते आए हैं कि स्थायी शांति केवल शक्ति के बल पर स्थापित नहीं की जा सकती। उसका आरंभ करुणा से होता है, वह न्याय से सुदृढ़ होती है और संवाद से स्थायी बनती है।
इसी भावना को व्यक्त करते हुए बेलारूस के राष्ट्रपति अलेक्ज़ेंडर लुकाशेंको ने हाल ही में कहा, "आज हमें दीर्घकालिक शांति के लिए समझौतों और आपसी सहमति के माध्यम से शांतिपूर्ण समाधान तक पहुँचने के हर संभव प्रयास करने की आवश्यकता है।"
इस वैश्विक अपील के समर्थन में अनेक अंतरराष्ट्रीय नेताओं और मानवतावादियों ने ISCTH के साथ अपने विशेष संदेश साझा किए।
Swiss Parliament के सदस्य डॉ. एच. सी. निक गुगर ने कहा, "दुनिया आज अशांति की आग में जल रही है। विश्व नेताओं को टकराव के बजाय संवाद और प्रतिशोध के बजाय अहिंसा को चुनना होगा। संवाद कमजोरी नहीं है, बल्कि आगे बढ़ने का एकमात्र मार्ग है।"
FOREF, Europe के अध्यक्ष जान फिगेल ने कहा, "प्रत्येक मानव की गरिमा और उसके मूलभूत अधिकारों का सम्मान ही स्थायी शांति का सबसे सुनिश्चित मार्ग है।"
UN OCHA, UAE की प्रमुख सजेदा शावा ने कहा, "मेरी आशा है कि विश्व नेता विभाजन के बजाय संवाद, उदासीनता के बजाय करुणा का चयन करें और प्रत्येक निर्णय के केंद्र में मानवीय गरिमा को रखें।"
परम पावन दलाई लामा ने मार्गदर्शन देते हुए कहा, "शांति प्रत्येक व्यक्ति के भीतर से प्रारंभ होती है। स्थायी शांति बल प्रयोग से नहीं, बल्कि करुणा से प्राप्त होती है।"
वेटिकन के राज्य सचिव कार्डिनल पिएत्रो पारोलिन ने कहा, "आज आवश्यकता है कि शांति के पक्ष में और अधिक स्वर उठें, हथियारों की अंधी दौड़ के विरुद्ध और अधिक आवाज़ें उठें, तथा हमारे सबसे वंचित भाई-बहनों के समर्थन में अधिक लोग आगे आएँ।"
आज के प्रमुख वैश्विक आध्यात्मिक नेतृत्व में भारत की ओर से इस आह्वान को सबसे सशक्त स्वर देते हुए ISCTH के प्रेरणास्रोत मैत्रेय दादाश्रीजी ने कहा:
“विभाजनकारी, संकीर्ण सोच और स्वार्थ से प्रेरित प्रयास अपने अंतिम निर्णायक चरण में और अधिक तीव्र होते जा रहे हैं। याद रखें, युद्ध के दुष्परिणाम केवल मानव सभ्यता तक सीमित नहीं रहेंगे, बल्कि उस पृथ्वी को भी गहरी क्षति पहुँचाएँगे, जिसने अरबों वर्षों से जीवन का पालन-पोषण किया है। यदि युद्ध नहीं रुका, तो मानवता की पीड़ा सदियों तक गूँजेगी और पृथ्वी ऐसी क्षति झेलेगी, जिसकी भरपाई संभव नहीं होगी।
हम इस पृथ्वी के स्वामी नहीं, बल्कि इसके संरक्षक हैं। इसलिए हमारा कर्तव्य है कि हम इसकी रक्षा करें।
विश्व की लगभग 70 प्रतिशत जनसंख्या यूरोप और एशिया में रहती है। इसलिए मानवता के भविष्य के प्रति इन दोनों महाद्वीपों की विशेष जिम्मेदारी है। हमारी सहनशील और क्षमाशील माँ पृथ्वी पर अब और विनाश नहीं होना चाहिए।
हम रूस और यूक्रेन से विनम्र आग्रह करते हैं कि वे संवाद और समाधान का मार्ग अपनाएँ तथा स्थायी शांति स्थापित करें, ताकि मिलकर अपने क्षेत्र और पूरे विश्व के उज्ज्वल भविष्य के लिए कार्य किया जा सके।
एक परमात्मा के लिए—आइए, हम एक हों।
एक पृथ्वी के लिए—आइए, हम एक हों।”
मानवता की अंतरात्मा की ये आवाज़ें अब स्पष्ट रूप से सामने आ चुकी हैं। आज लिए गए निर्णय ही आने वाली पीढ़ियों की दुनिया का स्वरूप तय करेंगे। इतिहास के इस निर्णायक क्षण में ISCTH कि कामना है - प्रत्येक निर्णय संघर्ष से ऊपर मानव जीवन की रक्षा, प्रत्येक व्यक्ति की गरिमा और हमारी साझा पृथ्वी के भविष्य को सर्वोच्च प्राथमिकता दे।
आइए, विश्व में शांति स्थापित करें।
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